वह ललचाई नज़रों से मोहन की उन नई, चमचमाती किताबों को देख रहा था। किताबों की उस नई महक ने जैसे पूरे कमरे को सराबोर कर दिया था। मोहन उसका सहपाठी तो था ही, साथ ही पड़ोसी भी था। उसके बाल-मन के लिए मोहन बस एक दोस्त था, पर उसकी माँ अक्सर याद दिला देती थी कि वे जिस छत के नीचे सिर छुपाते हैं, वह मोहन के पिता की ही है।

आज स्कूल में कुछ चुनिंदा बच्चों को नई किताबें बांटी गई थीं, जिनमें मोहन भी एक था। वह उन किताबों को ऐसे टकटकी लगाकर देख रहा था, मानो वे कागज के पन्ने न होकर बेशकीमती हीरे-जवाहरात हों। उसका मन कर रहा था कि बस एक बार उन कोमल पन्नों को छू ले, अपनी उंगलियां उन पर फेरे। माँ की दी हुई सीख कि “चोरी करना पाप है” न होती, तो शायद आज वह अपने मोह पर काबू न पा पाता।
उसके नन्हे दिमाग में एक ही सवाल बार-बार कौंध रहा था— “सब कुछ मोहन को ही क्यों मिलता है?”
- अभी कुछ ही दिन पहले मैडम ने मोहन को नई वर्दी के लिए पैसे दिए थे।
- उसका अपना मन भी फटी हुई वर्दी को त्याग कर नई ड्रेस पहनने का था, जिसकी सिलाई कई जगहों से उधड़ चुकी थी। पर मैडम ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
- रोज सुबह जब वह अपनी माँ के साथ धूल भरे रास्तों पर पैदल चलकर स्कूल पहुँचता, तो मोहन को उसके पिता बुलेट पर शान से छोड़ने आते।
ईर्ष्या की एक हल्की सी लहर उसके मन में बैठने लगी थी। उसने ठान लिया कि आज वह चुप नहीं रहेगा। आखिर तीसरी कक्षा में उसने पूरी जान लगाकर पढ़ाई की थी और ‘प्रथम’ आया था। फिर उसे वह ईनाम और सम्मान क्यों नहीं मिला, जो मोहन को बिना मांगे मिल रहा था?
जैसे ही मैडम कक्षा में दाखिल हुईं, वह अपनी जगह से उठा और सीधा उनके पास जा खड़ा हुआ। उसकी आँखों में शिकायत थी और आवाज़ में एक मासूम सा दर्द। उसने हिम्मत जुटाकर पूछ ही लिया:
“मैडम, मोहन को ही सब कुछ क्यों मिलता है? नई ड्रेस के पैसे भी उसे मिले और अब ये नई किताबें भी! मैं भी तो क्लास में फर्स्ट आया था, फिर मुझे क्यों कुछ नहीं मिलता?”
पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया। मैडम ने उस बालक के फटे हुए कॉलर और उसकी मासूम उम्मीद से भरी आँखों को देखा। उनकी आँखें डबडबा आईं। उन्होंने एक लंबी सांस ली और बड़े ही भारी मन से बस इतना कहा:
“बेटा, मोहन ‘एससी’ (SC) है और तुम ‘जनरल’ (General) जाति के हो!”
वह बच्चा वहीं ठिठक गया। उसे समझ नहीं आया कि ये ‘जातियां’ किताबों और कपड़ों के बीच दीवार बनकर कैसे खड़ी हो गईं। मैडम की भीगी आँखें और उसका वह निरुत्तर चेहरा उस दिन व्यवस्था के एक ऐसे सच से टकराया, जिसका बोझ उसके नन्हे कंधों के लिए बहुत भारी था।